20 जनवरी 2025 को डोनाल्ड जे. ट्रंप ने अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में दूसरी बार शपथ ली, जिससे विश्व राजनीति पर व्यापक प्रभाव पड़ा है। उनके दोबारा ओवल ऑफिस में प्रवेश के साथ ही घरेलू और विदेशी नीतियों में कई महत्वपूर्ण घोषणाएँ हुईं। यह लेख ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के वैश्विक राजनीतिक प्रभावों और रणनीतिक, रक्षा, आर्थिक और बहुपक्षीय संदर्भों में भारत-अमेरिका संबंधों पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण करता है।
1. ‘अमेरिका फर्स्ट’ सिद्धांत की पुनर्बहाली
राष्ट्रपति ट्रंप के उद्घाटन भाषण में ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के पुनरोद्धार को रेखांकित किया गया। यह नीति अमेरिकी आर्थिक और रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देती है। ट्रंप की घोषणाओं में शामिल हैं:
- व्यापार समझौतों का पुनर्समझौता: व्यापार असंतुलन को सुधारने के लिए द्विपक्षीय समझौतों पर ध्यान।
- ऊर्जा प्रभुत्व: अमेरिकी जीवाश्म ईंधन के निर्यात को बढ़ावा देना और अंतरराष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं को कम करना।
- सैन्य प्रतिबद्धताओं की समीक्षा: नाटो सहयोगियों और अन्य भागीदारों से रक्षा खर्च बढ़ाने की मांग।
2. भू-राजनीतिक पुनर्संरेखण
ट्रंप की नीतियाँ वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करेंगी:
- अमेरिका-चीन संबंध: चीन के प्रति सख्त रुख, जिसमें आर्थिक पृथक्करण, इंडो-पैसिफिक में सैन्य उपस्थिति बढ़ाना, और चीनी संस्थाओं पर प्रतिबंध शामिल हैं।
- मध्य पूर्व रणनीति: इज़राइल और खाड़ी देशों के साथ गठबंधन को मजबूत करना और क्षेत्रीय संघर्षों में प्रत्यक्ष सैन्य भागीदारी को कम करना।
- यूरोप और नाटो: यूरोपीय सहयोगियों के साथ संबंधों में तनाव, विशेष रूप से रक्षा खर्च और एकतरफावाद के कारण।
3. रणनीतिक द्विपक्षवाद पर ध्यान
संयुक्त राष्ट्र, डब्ल्यूटीओ और डब्ल्यूएचओ जैसे बहुपक्षीय संस्थानों को ट्रंप के नेतृत्व में और अधिक उपेक्षा का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि उनकी सरकार द्विपक्षीय समझौतों और लेन-देन आधारित कूटनीति पर जोर दे रही है।
भारत और अमेरिका के बीच संबंध पिछले कुछ दशकों में मजबूत हुए हैं, और ट्रंप के दूसरे कार्यकाल से दोनों देशों के लिए अवसर और चुनौतियाँ दोनों पैदा हो सकती हैं। प्रमुख प्रभाव क्षेत्रों में शामिल हैं:
1. रणनीतिक साझेदारी
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र भारत-अमेरिका रणनीतिक समन्वय का केंद्र बना रहेगा। ट्रंप के नेतृत्व में:
- क्वाड सहयोग: भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया चीन की बढ़ती आक्रामकता का मुकाबला करने के लिए क्वाड गठबंधन को मजबूत करेंगे।
- रक्षा सहयोग: उन्नत सैन्य अभ्यास और प्रौद्योगिकी-साझाकरण समझौतों, जैसे बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट (BECA), के माध्यम से भारत की रणनीतिक क्षमताओं को बढ़ाया जाएगा।
- अफगानिस्तान और दक्षिण एशिया: अफगानिस्तान से ट्रंप की वापसी नीति भारत को क्षेत्रीय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित कर सकती है, जिसके लिए भारत-अमेरिका के घनिष्ठ समन्वय की आवश्यकता होगी।
2. रक्षा संबंध
ट्रंप प्रशासन ने पहले ही भारत को उन्नत लड़ाकू विमानों और मिसाइल प्रणालियों की महत्वपूर्ण बिक्री को मंजूरी दी है। दूसरे कार्यकाल में:
- भारत की अत्याधुनिक रक्षा प्रौद्योगिकियों की खरीद को बढ़ावा मिलेगा।
- सह-उत्पादन और रक्षा पहल को प्रोत्साहन मिलेगा।
- हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की नौसैनिक क्षमताओं को मजबूत किया जाएगा।
3. आर्थिक संबंध
भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक संबंधों में वृद्धि और संघर्ष दोनों की संभावना है:
- व्यापार विवाद: व्यापार घाटे को कम करने के लिए ट्रंप का जोर भारत पर शुल्क कम करने और अमेरिकी सामानों के लिए बाजार खोलने का दबाव डाल सकता है।
- ऊर्जा सहयोग: भारत को अमेरिकी तेल और प्राकृतिक गैस के निर्यात का विस्तार ट्रंप की ऊर्जा प्रभुत्व रणनीति के अनुरूप होगा।
- प्रौद्योगिकी और नवाचार: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर्स और स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ेगा।
4. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर साझेदारी
भारत और अमेरिका वैश्विक शासन संस्थानों में सुधार के लिए समान हित साझा करते हैं। ट्रंप का लेन-देन आधारित दृष्टिकोण निम्नलिखित परिणाम ला सकता है:
- भारत की वैश्विक आकांक्षाओं का समर्थन: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट और बहुपक्षीय संगठनों में नेतृत्व भूमिकाओं के लिए भारत का समर्थन।
- जलवायु कूटनीति: जलवायु नीतियों पर संभावित मतभेद, क्योंकि ट्रंप वैश्विक जलवायु समझौतों के प्रति संदेह रखते हैं।
- आतंकवाद विरोधी प्रयास: पाकिस्तान से उत्पन्न खतरों पर ध्यान केंद्रित करते हुए आतंकवाद से लड़ने के लिए सहयोग।
चुनौतियाँ
- नीतियों में अनिश्चितता: ट्रंप का अप्रत्याशित दृष्टिकोण दीर्घकालिक रणनीतिक योजना को जटिल बना सकता है।
- संरक्षणवादी उपाय: व्यापार संघर्ष, आईटी सेवाओं और कृषि जैसे क्षेत्रों को प्रभावित कर सकते हैं।
- भू-राजनीतिक दबाव: अमेरिका और अन्य प्रमुख शक्तियों, विशेष रूप से रूस और चीन, के साथ संबंधों को संतुलित करना भारत के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
अवसर
- द्विपक्षीय सहयोग में वृद्धि: रक्षा, ऊर्जा और प्रौद्योगिकी साझेदारी को मजबूत करना।
- इंडो-पैसिफिक में नेतृत्व: मुक्त, खुले और समावेशी इंडो-पैसिफिक को सुनिश्चित करने के लिए संयुक्त प्रयास।
- व्यापार में पारस्परिक लाभ: आर्थिक संबंधों को बढ़ावा देने के लिए पूरक क्षमताओं का लाभ उठाना।
डोनाल्ड जे. ट्रंप का दूसरा कार्यकाल विश्व राजनीतिक गतिशीलता को फिर से परिभाषित करने के लिए तैयार है, जिसमें राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक द्विपक्षवाद पर जोर दिया जाएगा। भारत के लिए, यह संबंधों को गहरा करने और चुनौतियों का सामना करने के अवसर प्रस्तुत करता है। लोकतांत्रिक मूल्यों और रणनीतिक हितों पर आधारित भारत-अमेरिका संबंध, संभावित बाधाओं के बावजूद, मजबूत होने की संभावना है। रक्षा, व्यापार और बहुपक्षीय साझेदारी में बढ़ा हुआ सहयोग आने वाले वर्षों में इस महत्वपूर्ण साझेदारी की दिशा तय करेगा।
