बगराम एयरबेस — अमेरिका, भारत और तालिबान के बीच सामरिक टकराव का नया केन्द्र? 

बगराम (Bagram) एयरबेस अफगानिस्तान के परवान प्रांत में स्थित एक ऐतिहासिक और अत्यधिक सामरिक हवाई ठिकाना है। 2001–2021 के दौरान यह अमेरिकी अभियान का प्रमुख लॉजिस्टिक-और-इंटेलिजेंस बेस रहा। 2021 में अमेरिकी वापसी के बाद तालिबान ने बगराम पर नियंत्रण कर लिया। सितंबर–अक्टूबर 2025 में अमेरिका के कुछ राजनैतिक नेतृत्व द्वारा वहाँ फिर से सक्रियता दिखाने के इरादों पर बयानबाजी हुई — जिसपर तालिबान और अफ़गानिस्तान के पड़ोसी देशों ने कड़ी आपत्ति जताई है। नीचे विस्तार से कारण, भारत के दृष्टिकोण, तालिबान की रेखा और भविष्य की चुनौतियों का विश्लेषण दिया गया है।

  1. भू-स्थानिक लाभ: बगराम अफ़गानिस्तान के उत्तरी रास्तों के निकट है — यह दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और पश्चिम एशिया के संगम पर स्थित है। वहाँ से नज़दीकी क्षेत्रों (केंद्रीय एशिया के दरवाज़े, पाकिस्तान-अफगान सीमा, तथा चीन की कुछ संवेदनशील परियोजनाओं के सापेक्ष) पर निगरानी और फ़ौरन कार्रवाई की क्षमता उपलब्ध होती है।
  2. सुरक्षा-इंटेलिजेंस और लॉजिस्टिक्स: बगराम में हवाई, उड्डयन-रखरखाव, ड्रोन/इंटेलिजेंस और बड़ी लॉजिस्टिक क्षमताएँ थीं — ये क्षमता किसी भी बड़े तैनाती या निगरानी ऑपरेशन के लिये उपयोगी है। इसलिए कुछ नीतिकार इसे ‘फिर से उपयोगी’ मानते हैं।
  3. अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संदेश: अमेरिका के कुछ नेताओं के लिए बगराम पर चर्चा करना एक राजनीतिक संकेत भी है — परोपकारी/प्रत्यारोपित संदेश कि अमेरिका क्षेत्रीय घटनाओं पर नजर बनाए रखना चाहता है (विशेषकर चीन/रूस/प्रतिद्वंद्वी प्रभाव के संदर्भ में)।

(उपरोक्त बिंदुओं के कारण बगराम को सामरिक री-एसेट/डिप्लॉयमेंट-हब के रूप में देखा जा रहा है।)

  1. पड़ोसी रणनीतिक गहरी दूरियों (strategic depth) और पाकिस्तान-संबंधी निहितार्थ: अगर कोई बाहरी शक्ति (किसी भी तरह) बगराम में सक्रिय हुई तो वह पाकिस्तान के रणनीतिक-गहरी अवधारणा (strategic depth) पर प्रत्यक्ष दबाव बना सकती है; इसीलिए भारत के सुरक्षा-विश्लेषक इसे संवेदनशील मानते हैं। साथ ही, भारत की सामरिक रुचि यह सुनिश्चित करना होगी कि अफ़गानिस्तान में किसी भी बाहरी सैन्य ठिकाने के कारण दक्षिण एशिया का असंतुलन न बढ़े।
  2. केंद्रीय एशिया तक पहुँच और ऊर्जा-पथ: बगराम से मध्य एशिया के मार्गों की नज़दीकी के कारण दिल्ली के लिये क्षेत्रीय कनेक्टिविटी, ऊर्जा-रूट और रिश्तों के पार-प्रभाव मायने रखते हैं — विशेषकर पाकिस्तान-चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच। भारत के भू-राजनीतिक हित यह चाहते हैं कि अफ़गानिस्तान में कोई एक बाहरी शक्ति-प्रभाव पूर्णतः हावी न हो।
  3. सॉफ़्ट-पावर व कूटनीति का आयाम: भारत परंपरागत रूप से अफ़गानिस्तान में विकास, बुनियादी ढाँचा और मानवीय सहायता के जरिए प्रभाव बढ़ाता रहा है; किसी भी सैन्य-ठिकाने के चलते ये उत्पादनात्मक रास्ते प्रभावित हो सकते हैं और भारत को वैकल्पिक रणनीतियाँ अपनानी पड़ सकती हैं।

नतीजा — बगराम का कोई भी सैन्यरण किसी भी बड़े पड़ोसी-प्रभावशाली खेल में दिल्ली के हितों को सीधे प्रभावित कर सकता है; इसलिए भारत अपनी पॉलिसी में सतर्क और बहुपक्षीय संतुलन चाहेगा।

वर्तमान (अक्टूबर–नवंबर 2025) निर्णायक तस्वीर यह है कि:

  • अमेरिका के कुछ नेता (राजनीतिक बयानों के ज़रिये) बगराम पर लौटने या वहाँ पहुँच बनाए रखने की बात कर रहे हैं; पर प्रशासनिक/कूटनीतिक सड़कें जटिल हैं।
  • भारत ने — औपचारिक रूप से — क्षेत्रीय स्थिरता और अफ़गान-सार्वभौमता के पक्ष में रुख अपनाया है। क्षेत्रीय साझेदारों के साथ मिलकर (रूस-चीन-एक भाग) कुछ देशों ने भी अमेरिका की प्रत्यक्ष सैन्य वापसी के खिलाफ संकेत दिए हैं। इसलिए खुला ‘सामना’ न सही, पर अमेरिका और भारत(और उनके सहयोगियों) की प्राथमिकताएँ अलग-अलग दिखती हैं — अमेरिका बड़े स्तर पर निरन्तर सैन्य पहुँच में रुचि दिखा सकता है; भारत प्राथमिकता स्थिरता, गैर-सैन्य सहयोग और पड़ोसी देशों के साथ सामंजस्य रखता है।

संक्षेप: यह ‘सरासर आमने-सामने टकराव’ से ज़्यादा नीतिगत और क्षमताओं के स्तर पर अंतर दिखता है — जहाँ अमेरिका-अवसर/अभिप्राय अलग हैं और भारत क्षेत्र-संतुलन की नीति पर केन्द्रित है।

तालिबान ने साफ़ शब्दों में बगराम के किसी भी बाहरी देन-लेन या अड्डे को वापस देने का विरोध किया है। तालिबान प्रवक्ता और अफगान रक्षा-नेता कहते रहे हैं कि अफगान जमीन किसी भी विदेशी को नहीं दी जाएगी, और 2020 के दोहा समझौते के तहत विदेशी हस्तक्षेप से परहेज़ का आह्वान करते हैं। तालिबान का तर्क है कि किसी भी तरह की ‘भूमि हस्ताक्षेप’ उनके आंतरिक समर्थन को कमजोर कर सकता है और घरेलू राजनीतिक जोखिम बढ़ा सकता है।

एक और बिंदु: तालिबान आर्थिक और राजनयिक लाभों के लिए पश्चिम से जुड़ना चाहते हैं — पर बगराम देने जैसा कदम उनके घरेलू समर्थकों व राजनीतिक-सुविचारकों के लिये अस्वीकार्य होगा। इसलिए तालिबान-रूख सख्त और अनुपस्थित नीतिगत समझौते पर निर्भर है।

  1. क्षेत्रीय ध्रुवीकरण और बहुपक्षीय विरोध: अगर अमेरिका खुलकर बगराम में वापसी की कोशिश करता है तो रूस-चीन और कुछ क्षेत्रीय देश (और भारत की सतर्कता) के कारण एक राजनीतिक/कूटनीतिक मोर्चा बन सकता है; इससे अफगानिस्तान का बँटना और सुरक्षा-दबाव बढ़ सकता है।
  2. अफगान घरेलू अस्थिरता: तालिबान का कठोर रुख अगर आर्थिक दबाव/आंतरिक असंतोष पैदा करे तो वह बाहरी शक्तियों के साथ समझौते पर मजबूर हो सकता है — या उल्टा, कठोर रुख उभरते चीन/पाकिस्तान-समर्थित विकल्पों को तेज कर देगा। इससे भारत-अमेरिका-तालिबान के रिश्तों में अनिश्चितता बढ़ सकती है।
  3. पड़ोसी देशों की प्रतिक्रिया और प्रतिस्पर्धा: पाकिस्तान, रूस और चीन अपनी-अपनी रणनीतिक इच्छाओं के अनुरूप प्रतिक्रिया देंगे; बगराम-जैसे मुद्दे पर इन देशों की भागीदारी दक्षिण एशिया-मध्य एशिया समीकरण बदल सकती है — इसमें भारत को कूटनीतिक चुनौतियाँ झेलनी पड़ सकती हैं।
  4. आर्थिक/सैन्य प्रतिबन्ध और निर्भरता: तालिबान को अंतरराष्ट्रीय मान्यता और आर्थिक सहायता चाहिए — बगराम के सवाल पर कठोरता रखने से मदद कम मिल सकती है। पर अगर तालिबान कुछ समझौते करता है तो क्षेत्रीय विरोध जन्म ले सकता है — दोनों ही स्थितियाँ जोखिम लिये हैं।
  5. गैर-रवैज़ (proxy) संघर्ष और खुफिया गतिविधियाँ: अगर कोई बड़ी शक्ति सीधे/अप्रत्यक्ष रूप से अफगानिस्तान में सैन्य-सुविधा चाहती है तो वहीं से दूसरे कोनों में खुफिया/हाइब्रिड गतिविधियाँ बढ़ सकती हैं — जो क्षेत्रीय अस्थिरता को जन्म दे सकती हैं।

  • बहुपक्षीय कूटनीति: भारत को क्षेत्रीय साझेदारों के साथ मिलकर यह रेखांकित करना चाहिए कि अफगानिस्तान का सैन्यीकरण शांति के हित में नहीं।
  • विकास-कूटनीति तेज़ करना: सैन्य विकल्पों के बजाय मानवीय सहायता, आर्थिक पुनर्निर्माण और ऊर्जा-कनेक्टिविटी पर जोर देना ताकि अफगानिस्तान में स्थिरता पसंदीदा विकल्प बने।
  • सुरक्षा-सूचना साझेदारी: यदि अमेरिका/अन्य बड़े देश किसी तरह की उपस्थिति चाहते हैं, तो भारत को क्षेत्रीय सुरक्षा पर इसके दीर्घकालिक प्रभावों को ध्यान में रखते हुए अपनी चिंताएँ वैश्विक-मंच पर उठानी चाहिए।

बगराम सिर्फ एक एयरफील्ड नहीं — उसकी भू-रणनीतिक स्थिति के कारण यह दक्षिण और मध्य एशिया के सामरिक संतुलन का प्रतीक बन गया है। सितंबर–अक्टूबर 2025 के घटनाक्रम ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका की वापसी की चर्चा, तालिबान की सख्ती और क्षेत्रीय विरोध के बीच एक जटिल कूटनीतिक लड़खड़ाहट मौजूद है। भारत के लिये प्राथमिकता फिलहाल स्थिरता, गैर-सैन्यीकृत मदद और क्षेत्रीय सामंजस्य बनाए रखना रहेगा — पर यदि वास्तविकता में कोई शक्ति बगराम-प्रकार की भौतिक उपस्थिति बनाने की कोशिश करे तो दिल्ली को भी निर्णायक कूटनीतिक और सुरक्षा विकल्प अपनाने पड़ सकते हैं।

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