India and China
यूपीएससी उम्मीदवारों के लिए भारत की विदेश नीति की गतिशीलता, चीन मुद्दे की पेचीदगियों और प्रमुख वैश्विक शक्तियों से जुड़े भू-राजनीतिक युद्धाभ्यास के व्यापक निहितार्थ को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह न केवल परीक्षा की दृष्टि से बल्कि एक प्रभावी सिविल सेवक के रूप में भी आवश्यक है, क्योंकि यह भारत की अंतर्राष्ट्रीय स्थिति और सुरक्षा को प्रभावित करता है।
भारत की विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा, आर्थिक विकास को बढ़ावा देना, और वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति को मजबूत करना है। भारत की विदेश नीति समय के साथ विकसित हुई है, जिसमें विभिन्न वैश्विक और क्षेत्रीय परिवर्तनों को शामिल किया गया है।
गुटनिरपेक्षता से बहुपक्षीयता तक: शीत युद्ध के दौरान, भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) का नेतृत्व किया, जिससे उसे दोनों महाशक्तियों (अमेरिका और सोवियत संघ) के बीच तटस्थ रहने का मौका मिला। हाल के वर्षों में, भारत ने बहुपक्षीय संगठनों में अपनी भागीदारी बढ़ाई है, जैसे कि ब्रिक्स, आईबीएसए, और शंघाई सहयोग संगठन (SCO)।
लुक ईस्ट से एक्ट ईस्ट: भारत ने अपनी ‘लुक ईस्ट’ नीति को ‘एक्ट ईस्ट’ नीति में परिवर्तित किया है, जिसका उद्देश्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करना है।
नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी: भारत ने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को प्राथमिकता दी है। इसका उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग को बढ़ावा देना है।
वैश्विक भूमिका: भारत अब वैश्विक मुद्दों पर एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभर रहा है, जैसे कि जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, और वैश्विक स्वास्थ्य। इसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग भी शामिल है।
भारत और चीन के बीच के संबंध कई महत्वपूर्ण और जटिल मुद्दों पर आधारित हैं, जिनमें सीमा विवाद, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय प्रभुत्व शामिल हैं।
सीमा विवाद: भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर लंबे समय से विवाद है। 1962 का युद्ध और हाल के डोकलाम और गलवान घाटी में संघर्ष दोनों देशों के बीच तनाव का प्रमुख कारण हैं।
आर्थिक प्रतिस्पर्धा: भारत और चीन के बीच आर्थिक क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा है। चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, लेकिन व्यापार असंतुलन और चीनी उत्पादों पर निर्भरता भारत के लिए चिंता का विषय हैं।
क्षेत्रीय प्रभुत्व: चीन की ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) और हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी बढ़ती उपस्थिति भारत के लिए चुनौतीपूर्ण हैं। इसके अलावा, पाकिस्तान के साथ चीन के निकट संबंध और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) भारत की रणनीतिक चिंताओं को बढ़ाते हैं।
वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धा: संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भारत और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा है। भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग और विभिन्न वैश्विक मुद्दों पर दोनों देशों की विभिन्न दृष्टिकोण भी महत्वपूर्ण हैं।
भारत की विदेश नीति पर प्रमुख वैश्विक शक्तियों का प्रभाव महत्वपूर्ण है, खासकर अमेरिका, रूस और यूरोपीय संघ के संदर्भ में।
अमेरिका: भारत और अमेरिका के संबंध पिछले दो दशकों में काफी मजबूत हुए हैं। दोनों देशों ने रक्षा, व्यापार और प्रौद्योगिकी में कई समझौते किए हैं। अमेरिका का भारत को रणनीतिक साझेदार के रूप में देखना, विशेषकर चीन के प्रभाव को संतुलित करने के संदर्भ में, महत्वपूर्ण है। क्वाड (Quad) जैसे समूहों में भारत की भागीदारी भी इसी रणनीति का हिस्सा है।
रूस: भारत और रूस के बीच लंबे समय से मजबूत संबंध रहे हैं, विशेषकर रक्षा क्षेत्र में। हालांकि, हाल के वर्षों में रूस और चीन के निकट संबंधों ने भारत के लिए नई चुनौतियाँ पेश की हैं। फिर भी, भारत रूस के साथ अपनी पारंपरिक मित्रता को बनाए रखना चाहता है, विशेषकर बहुपक्षीय संगठनों में।
यूरोपीय संघ: भारत और यूरोपीय संघ के बीच आर्थिक और राजनीतिक संबंध महत्वपूर्ण हैं। यूरोपीय संघ भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है, और दोनों के बीच रणनीतिक साझेदारी क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर सहयोग को बढ़ावा देती है।
अन्य शक्तियाँ: जापान, ऑस्ट्रेलिया और ASEAN देशों के साथ भारत के संबंध भी महत्वपूर्ण हैं। ये संबंध आर्थिक सहयोग, समुद्री सुरक्षा, और क्षेत्रीय स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारत की विदेश नीति की गतिशीलता, चीन मुद्दे की पेचीदगियों और प्रमुख वैश्विक शक्तियों से जुड़े भू-राजनीतिक युद्धाभ्यास को समझना यूपीएससी उम्मीदवारों के लिए आवश्यक है। यह न केवल भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास को प्रभावित करता है, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका को भी निर्धारित करता है। उम्मीदवारों को इन पहलुओं की गहन समझ होनी चाहिए ताकि वे एक प्रभावी और सूचित सिविल सेवक बन सकें।
