बगराम (Bagram) एयरबेस अफगानिस्तान के परवान प्रांत में स्थित एक ऐतिहासिक और अत्यधिक सामरिक हवाई ठिकाना है। 2001–2021 के दौरान यह अमेरिकी अभियान का प्रमुख लॉजिस्टिक-और-इंटेलिजेंस बेस रहा। 2021 में अमेरिकी वापसी के बाद तालिबान ने बगराम पर नियंत्रण कर लिया। सितंबर–अक्टूबर 2025 में अमेरिका के कुछ राजनैतिक नेतृत्व द्वारा वहाँ फिर से सक्रियता दिखाने के इरादों पर बयानबाजी हुई — जिसपर तालिबान और अफ़गानिस्तान के पड़ोसी देशों ने कड़ी आपत्ति जताई है। नीचे विस्तार से कारण, भारत के दृष्टिकोण, तालिबान की रेखा और भविष्य की चुनौतियों का विश्लेषण दिया गया है।
(उपरोक्त बिंदुओं के कारण बगराम को सामरिक री-एसेट/डिप्लॉयमेंट-हब के रूप में देखा जा रहा है।)
नतीजा — बगराम का कोई भी सैन्यरण किसी भी बड़े पड़ोसी-प्रभावशाली खेल में दिल्ली के हितों को सीधे प्रभावित कर सकता है; इसलिए भारत अपनी पॉलिसी में सतर्क और बहुपक्षीय संतुलन चाहेगा।
वर्तमान (अक्टूबर–नवंबर 2025) निर्णायक तस्वीर यह है कि:
संक्षेप: यह ‘सरासर आमने-सामने टकराव’ से ज़्यादा नीतिगत और क्षमताओं के स्तर पर अंतर दिखता है — जहाँ अमेरिका-अवसर/अभिप्राय अलग हैं और भारत क्षेत्र-संतुलन की नीति पर केन्द्रित है।
तालिबान ने साफ़ शब्दों में बगराम के किसी भी बाहरी देन-लेन या अड्डे को वापस देने का विरोध किया है। तालिबान प्रवक्ता और अफगान रक्षा-नेता कहते रहे हैं कि अफगान जमीन किसी भी विदेशी को नहीं दी जाएगी, और 2020 के दोहा समझौते के तहत विदेशी हस्तक्षेप से परहेज़ का आह्वान करते हैं। तालिबान का तर्क है कि किसी भी तरह की ‘भूमि हस्ताक्षेप’ उनके आंतरिक समर्थन को कमजोर कर सकता है और घरेलू राजनीतिक जोखिम बढ़ा सकता है।
एक और बिंदु: तालिबान आर्थिक और राजनयिक लाभों के लिए पश्चिम से जुड़ना चाहते हैं — पर बगराम देने जैसा कदम उनके घरेलू समर्थकों व राजनीतिक-सुविचारकों के लिये अस्वीकार्य होगा। इसलिए तालिबान-रूख सख्त और अनुपस्थित नीतिगत समझौते पर निर्भर है।
बगराम सिर्फ एक एयरफील्ड नहीं — उसकी भू-रणनीतिक स्थिति के कारण यह दक्षिण और मध्य एशिया के सामरिक संतुलन का प्रतीक बन गया है। सितंबर–अक्टूबर 2025 के घटनाक्रम ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका की वापसी की चर्चा, तालिबान की सख्ती और क्षेत्रीय विरोध के बीच एक जटिल कूटनीतिक लड़खड़ाहट मौजूद है। भारत के लिये प्राथमिकता फिलहाल स्थिरता, गैर-सैन्यीकृत मदद और क्षेत्रीय सामंजस्य बनाए रखना रहेगा — पर यदि वास्तविकता में कोई शक्ति बगराम-प्रकार की भौतिक उपस्थिति बनाने की कोशिश करे तो दिल्ली को भी निर्णायक कूटनीतिक और सुरक्षा विकल्प अपनाने पड़ सकते हैं।
Hindi News
रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध 21वीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक संकटों में से एक रहा है। यह संघर्ष 2014 में रूस द्वारा क्रीमिया पर कब्ज़े के साथ शुरू हुआ और 2022 में पूर्ण पैमाने पर आक्रमण में बदल गया। अमेरिका सहित कई देशों द्वारा शांति स्थापित करने के प्रयास किए गए, लेकिन सफलता नहीं मिली।
हाल ही में, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रंप और यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की के बीच शांति वार्ता विफल रही, जिससे वैश्विक मंच पर युद्ध के बढ़ते खतरे को लेकर चर्चा तेज़ हो गई। यूरोपीय संघ के अधिकांश देश यूक्रेन के समर्थन में खड़े हैं, जबकि रूस चीन, ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देशों के साथ अपने संबंध मजबूत कर रहा है। इस स्थिति ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दुनिया एक नए विश्व युद्ध की ओर बढ़ रही है? इसके अलावा, एक नए वैश्विक सत्ता संतुलन (New World Order) के उभरने की संभावना भी बढ़ गई है।
डोनाल्ड ट्रंप खुद को एक कुशल वार्ताकार मानते रहे हैं और कई बार दावा किया है कि अगर वे फिर से राष्ट्रपति चुने जाते हैं, तो 24 घंटे के भीतर रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त कर सकते हैं। हालांकि, उनकी कूटनीतिक वार्ताएँ कोई ठोस परिणाम नहीं दे पाईं।
वार्ता की विफलता के कुछ प्रमुख कारण हैं:
इस स्थिति में, वार्ता की विफलता का अर्थ है कि युद्ध निकट भविष्य में समाप्त होने की संभावना नहीं है।
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और पश्चिमी देशों के कई नेताओं ने बार-बार चेतावनी दी है कि यह युद्ध वैश्विक स्तर पर बड़ा संघर्ष बन सकता है। कुछ महत्वपूर्ण कारण जो तीसरे विश्व युद्ध की आशंका को बढ़ा रहे हैं:
फिलहाल, तीसरा विश्व युद्ध निश्चित नहीं है, लेकिन इसकी संभावना पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।
यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक सत्ता संतुलन को बदल दिया है। अमेरिका के नेतृत्व वाली एकध्रुवीय (Unipolar) दुनिया की जगह अब एक बहुध्रुवीय (Multipolar) विश्व व्यवस्था उभर रही है, जहां रूस, चीन और अन्य उभरती शक्तियाँ पश्चिमी प्रभाव को चुनौती दे रही हैं।
यूक्रेन युद्ध ने पहले ही वैश्विक राजनीति को बदल दिया है, और इसके दीर्घकालिक परिणाम अभी भी स्पष्ट नहीं हैं। तीसरे विश्व युद्ध की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता, लेकिन इस समय दुनिया एक नए शक्ति संतुलन की ओर बढ़ रही है।
भविष्य में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह नया विश्व व्यवस्था अधिक स्थिरता लाएगा या वैश्विक संघर्षों को और बढ़ावा देगा। फिलहाल, यूक्रेन संघर्ष वैश्विक प्रभाव वाले एक बड़े भू-राजनीतिक खेल का केंद्र बना हुआ है।
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20 जनवरी 2025 को डोनाल्ड जे. ट्रंप ने अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में दूसरी बार शपथ ली, जिससे विश्व राजनीति पर व्यापक प्रभाव पड़ा है। उनके दोबारा ओवल ऑफिस में प्रवेश के साथ ही घरेलू और विदेशी नीतियों में कई महत्वपूर्ण घोषणाएँ हुईं। यह लेख ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के वैश्विक राजनीतिक प्रभावों और रणनीतिक, रक्षा, आर्थिक और बहुपक्षीय संदर्भों में भारत-अमेरिका संबंधों पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण करता है।
राष्ट्रपति ट्रंप के उद्घाटन भाषण में ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के पुनरोद्धार को रेखांकित किया गया। यह नीति अमेरिकी आर्थिक और रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देती है। ट्रंप की घोषणाओं में शामिल हैं:
ट्रंप की नीतियाँ वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करेंगी:
संयुक्त राष्ट्र, डब्ल्यूटीओ और डब्ल्यूएचओ जैसे बहुपक्षीय संस्थानों को ट्रंप के नेतृत्व में और अधिक उपेक्षा का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि उनकी सरकार द्विपक्षीय समझौतों और लेन-देन आधारित कूटनीति पर जोर दे रही है।
भारत और अमेरिका के बीच संबंध पिछले कुछ दशकों में मजबूत हुए हैं, और ट्रंप के दूसरे कार्यकाल से दोनों देशों के लिए अवसर और चुनौतियाँ दोनों पैदा हो सकती हैं। प्रमुख प्रभाव क्षेत्रों में शामिल हैं:
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र भारत-अमेरिका रणनीतिक समन्वय का केंद्र बना रहेगा। ट्रंप के नेतृत्व में:
ट्रंप प्रशासन ने पहले ही भारत को उन्नत लड़ाकू विमानों और मिसाइल प्रणालियों की महत्वपूर्ण बिक्री को मंजूरी दी है। दूसरे कार्यकाल में:
भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक संबंधों में वृद्धि और संघर्ष दोनों की संभावना है:
भारत और अमेरिका वैश्विक शासन संस्थानों में सुधार के लिए समान हित साझा करते हैं। ट्रंप का लेन-देन आधारित दृष्टिकोण निम्नलिखित परिणाम ला सकता है:
डोनाल्ड जे. ट्रंप का दूसरा कार्यकाल विश्व राजनीतिक गतिशीलता को फिर से परिभाषित करने के लिए तैयार है, जिसमें राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक द्विपक्षवाद पर जोर दिया जाएगा। भारत के लिए, यह संबंधों को गहरा करने और चुनौतियों का सामना करने के अवसर प्रस्तुत करता है। लोकतांत्रिक मूल्यों और रणनीतिक हितों पर आधारित भारत-अमेरिका संबंध, संभावित बाधाओं के बावजूद, मजबूत होने की संभावना है। रक्षा, व्यापार और बहुपक्षीय साझेदारी में बढ़ा हुआ सहयोग आने वाले वर्षों में इस महत्वपूर्ण साझेदारी की दिशा तय करेगा।
परिचय: भारत और पोलैंड के बीच संबंधों का एक अद्वितीय ऐतिहासिक महत्व है, जो गुजरात के जामनगर के महाराजा दिग्विजय सिंह रणजीत सिंह जाडेजा के कार्यों से जुड़ा हुआ है। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान, जब नाजी जर्मनी ने पोलैंड पर आक्रमण किया, तो हजारों पोलिश नागरिक, विशेषकर महिलाएं और बच्चे, यातनागृहों में कैद कर दिए गए। इस संकट की घड़ी में, एक दूरस्थ भूमि से एक आशा की किरण उभरी—महाराजा दिग्विजय सिंह, जिन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों की अवहेलना करते हुए इन पोलिश शरणार्थियों को अपने राज्य में शरण दी।
महाराजा दिग्विजय सिंह का पोलिश शरणार्थियों के प्रति संवेदनशीलता और साहस का यह कार्य उनकी महान मानवीयता का प्रतीक है। जब अधिकांश देशों ने पोलैंड को लगभग छोड़ दिया था, तब महाराजा ने इन शरणार्थियों का अपने राज्य में स्वागत किया। उन्होंने न केवल उन्हें आश्रय प्रदान किया, बल्कि अपने ग्रीष्मकालीन महल नवानगर के पास “बालाचड़ी” नामक एक विशेष बस्ती भी बनवाई। यह बस्ती एक सुरक्षित आश्रयस्थल के रूप में कार्य करती थी, जहां पोलिश बच्चों को शिक्षा, चिकित्सा सुविधा और घर जैसी गर्माहट मिली। महाराजा के इस करुणामय कार्य के कारण उन्हें पोलैंड में आज भी “बापू” या “गुड महाराजा” के नाम से सम्मानित किया जाता है।
जामनगर के महाराजा दिग्विजय सिंह रणजीतसिंह जाडेजा का नाम इतिहास के उन पन्नों में अंकित है जो मानवता और करुणा का प्रतीक हैं। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जब पोलैंड पर नाजी जर्मनी का आक्रमण हुआ, तब पोलैंड के कई नागरिकों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों को यातनागृहों में डाल दिया गया। इन अत्याचारों से बचने के लिए कई लोग भागकर विभिन्न देशों में शरण की तलाश करने लगे। ऐसे समय में, जब अधिकांश देशों ने उन्हें शरण देने से इंकार कर दिया, महाराजा दिग्विजय सिंह ने ब्रिटिश सरकार के विरोध के बावजूद, अपनी मानवता का परिचय देते हुए इन पोलिश शरणार्थियों को अपने राज्य जामनगर में शरण दी।
महाराजा दिग्विजय सिंह ने न केवल पोलिश शरणार्थियों को अपने राज्य में शरण दी, बल्कि उनके लिए एक विशेष स्थान ‘बालाचड़ी’ में आश्रय स्थल का निर्माण भी करवाया। यह आश्रय स्थल एक महल जैसा था, जहां पोलिश शरणार्थी न केवल सुरक्षित महसूस करते थे, बल्कि उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, और भोजन जैसी आवश्यकताओं की भी पूरी सुविधा मिली। यह कार्य न केवल उस समय के लिए बल्कि भविष्य में भी एक उदाहरण बना, जिसे आज भी पोलैंड में सम्मान के साथ याद किया जाता है।
इस संदर्भ में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पोलैंड यात्रा—जो 45 वर्षों के बाद हो रही है—असाधारण महत्व रखती है। यह यात्रा केवल एक राजनयिक मुलाकात नहीं है, बल्कि यह एक प्रतीकात्मक संकेत है जो महाराजा दिग्विजय सिंह द्वारा स्थापित गहरे संबंधों की याद दिलाता है। प्रधानमंत्री की यह यात्रा इस ऐतिहासिक संबंध को पुनर्जीवित करने, महाराजा की विरासत का सम्मान करने और भारत-पोलैंड के द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने का अवसर है।
भारत-पोलैंड संबंधों को मजबूत करने की अपार संभावनाएं हैं। पोलैंड, जो यूरोपीय संघ का सदस्य है, भारत के लिए व्यापार, प्रौद्योगिकी, रक्षा और शिक्षा के क्षेत्रों में रणनीतिक महत्व रखता है। प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान, इन क्षेत्रों में सहयोग को और गहरा करने पर विचार होगा। भारत और पोलैंड पहले से ही मजबूत आर्थिक संबंध साझा करते हैं, और पोलैंड केंद्रीय यूरोप में भारत का एक प्रमुख व्यापारिक भागीदार है। इस यात्रा के दौरान नए समझौतों, संयुक्त उद्यमों और विशेषकर सूचना प्रौद्योगिकी, हरित ऊर्जा और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में निवेश में वृद्धि की संभावनाएं हैं।
इसके अलावा, सांस्कृतिक आदान-प्रदान को पुनर्जीवित किया जा सकता है, जिसमें शिक्षा और अनुसंधान सहयोग पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है। दोनों देशों के बीच घनिष्ठ साझेदारी से, वैश्विक चुनौतियों जैसे जलवायु परिवर्तन, साइबर सुरक्षा और भू-राजनीतिक अस्थिरता का सामना करने में मदद मिलेगी।
वैश्विक स्तर पर, प्रधानमंत्री मोदी की पोलैंड यात्रा के महत्वपूर्ण प्रभाव हो सकते हैं। सबसे पहले, यह मध्य यूरोप में भारत की बढ़ती कूटनीतिक पहुंच को संकेत देती है, जो वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में रणनीतिक महत्व प्राप्त कर रही है। पोलैंड की भौगोलिक स्थिति इसे यूरोपीय संघ में एक महत्वपूर्ण सहयोगी बनाती है, और पोलैंड के साथ मजबूत संबंध भारत के ईयू में प्रभाव को बढ़ा सकते हैं।
दूसरे, यह यात्रा भारत की छवि को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में सुदृढ़ करेगी जो अपने ऐतिहासिक संबंधों को महत्व देता है और एक जिम्मेदार वैश्विक खिलाड़ी के रूप में कार्य करता है। महाराजा दिग्विजय सिंह की मानवीय विरासत को स्वीकार करके और उसके आधार पर संबंधों को मजबूत करके, भारत यह स्पष्ट करता है कि वह आर्थिक हितों से परे जाकर सद्भावना और सहयोग को बढ़ावा देता है।
अंततः, यह यात्रा भारत-ईयू संबंधों को मजबूत करने में एक उत्प्रेरक का काम कर सकती है, और अन्य मध्य और पूर्वी यूरोपीय देशों को भारत के साथ घनिष्ठ संबंध बनाने के लिए प्रेरित कर सकती है। जैसे-जैसे वैश्विक भू-राजनीति में परिवर्तन हो रहा है, भारत का यूरोप के साथ संबंध अधिक महत्वपूर्ण होता जा रहा है, और इस बदलते हुए संदर्भ में पोलैंड एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान महाराजा दिग्विजय सिंह की करुणा से प्रेरित ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पोलैंड यात्रा को एक विशेष संदर्भ प्रदान करती है। यह यात्रा केवल एक राजनयिक अभ्यास नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के बीच मित्रता को पुनः सुदृढ़ करने का प्रयास है, जो समान मानवीय मूल्यों और आपसी सम्मान पर आधारित है। जैसे-जैसे भारत वैश्विक स्तर पर अपनी उपस्थिति को मजबूत करने का प्रयास कर रहा है, प्रधानमंत्री की पोलैंड यात्रा द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने और व्यापक वैश्विक स्थिरता और सहयोग में योगदान देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकती है। UPSC परीक्षार्थियों के लिए यह आलेख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न केवल इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना पर प्रकाश डालता है, बल्कि आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में इतिहास की महत्वपूर्ण भूमिका को भी समझने में मदद करता है।
अमेरिका, जो स्वयं को लोकतंत्र का सबसे बड़ा रक्षक और मानवाधिकारों का हिमायती बताता है, ने विश्व के विभिन्न हिस्सों में अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए कई बार लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकारों को गिराने के प्रयास किए हैं। बांग्लादेश के सेंट मार्टिन द्वीप को लीज पर लेकर वहां सैन्य अड्डा बनाने की अमेरिकी मंशा और इसके पीछे के घटनाक्रम का खुलासा बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के वक्तव्यों ने किया है। यह प्रकरण अमेरिका की दोहरी भूमिका और कूटनीतिक चालों को उजागर करता है, जिससे भारत सहित अन्य देशों को भी सतर्क रहने की आवश्यकता है।
“बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कहा है कि अमेरिका बांग्लादेश से सेंट मार्टिन द्वीप लीज पर लेकर उसमें अपना सैन्य अड्डा बनाना चाहता था जिसके लिए वो तैयार नहीं थी जिसकी वजह से बांग्लादेश में छात्रों के माध्यम से अमेरिका ने विद्रोह करा कर उन्हें देश छोड़ने पर मजबूर किया”
अमेरिका एक ओर तो लोकतंत्र और मानवाधिकारों का समर्थन करने का दावा करता है, वहीं दूसरी ओर अपनी भू-राजनीतिक और सामरिक महत्वाकांक्षाओं के लिए वह लोकतांत्रिक संस्थाओं और सरकारों को कमजोर करने से नहीं हिचकिचाता। बांग्लादेश में सेंट मार्टिन द्वीप पर सैन्य अड्डा स्थापित करने की अमेरिकी योजना एक ऐसे ही उदाहरण के रूप में सामने आई है, जहां अमेरिका ने अपनी योजना को विफल होते देख बांग्लादेश की तत्कालीन सरकार के खिलाफ छात्रों के माध्यम से विद्रोह कराया।
इस घटना से यह स्पष्ट हो जाता है कि अमेरिका केवल अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए लोकतांत्रिक ढांचों का समर्थन करता है, और जब वे स्वार्थ पूरे नहीं होते, तो वह लोकतांत्रिक सरकारों को गिराने की कोशिश करता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि अमेरिका का मानवाधिकार और लोकतंत्र का समर्थन केवल एक façade है, जिसे वह अपने रणनीतिक उद्देश्यों को साधने के लिए इस्तेमाल करता है।
बांग्लादेश के सेंट मार्टिन द्वीप को लेकर शेख हसीना द्वारा की गई टिप्पणियों से यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका अपनी रणनीतिक स्थिति को मजबूत करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। शेख हसीना ने साफ़ तौर पर कहा है कि अमेरिका ने बांग्लादेश में छात्र आंदोलनों के माध्यम से अस्थिरता फैलाने का प्रयास किया, ताकि उनकी सरकार को गिराया जा सके। इसके बाद, बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचारों पर अमेरिका की चुप्पी ने उसकी दोहरी नीति को और भी उजागर कर दिया।
भारत को इस घटनाक्रम से एक महत्वपूर्ण सीख लेनी चाहिए। अमेरिका के साथ कूटनीतिक और सामरिक संबंध महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अमेरिका की दोहरी नीतियों से भी सावधान रहना आवश्यक है। भारत को अपनी विदेश नीति और सुरक्षा रणनीतियों में अमेरिका के साथ संतुलित और सतर्क दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
स्वतंत्र विदेश नीति: भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर जोर देना चाहिए और किसी भी वैश्विक शक्ति के दबाव में आने से बचना चाहिए।
रक्षा और सुरक्षा का सुदृढ़ीकरण: भारत को अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के लिए आंतरिक संसाधनों और क्षेत्रीय सहयोग पर अधिक ध्यान देना चाहिए, ताकि किसी भी बाहरी हस्तक्षेप का प्रभाव कम किया जा सके।
आर्थिक और रणनीतिक विविधता: भारत को अपनी आर्थिक और रणनीतिक साझेदारियों को विविधता देना चाहिए, ताकि किसी एक देश पर निर्भरता कम हो और किसी भी प्रकार के बाहरी दबाव का सामना किया जा सके।
मानवाधिकार और लोकतंत्र पर सतर्क दृष्टिकोण: भारत को अमेरिका की मानवाधिकार और लोकतंत्र के प्रति नीतियों का सम्यक मूल्यांकन करना चाहिए और उन घटनाओं से सीख लेनी चाहिए जहां अमेरिका की कथनी और करनी में अंतर स्पष्ट हुआ है।
बांग्लादेश में अमेरिकी हस्तक्षेप और इसके पश्चात् के घटनाक्रम से यह स्पष्ट हो गया है कि अमेरिका अपनी कूटनीतिक चालों के माध्यम से केवल अपने स्वार्थों की पूर्ति करता है, चाहे इसके लिए उसे लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर क्यों न करना पड़े। भारत को अमेरिका के साथ अपने संबंधों में सतर्कता और संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता है, ताकि वह किसी भी प्रकार की बाहरी रणनीतिक चालों का शिकार न बने। इसके लिए भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति, सुदृढ़ रक्षा और सुरक्षा व्यवस्था, और आर्थिक विविधता पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
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बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना का इस्तीफा और उसके बाद सेना का नियंत्रण भारतीय दृष्टिकोण के लिए कई संभावित खतरों और चुनौतियों को प्रस्तुत करता है। यहाँ कुछ प्रमुख क्षेत्र हैं जहाँ इस राजनीतिक उथल-पुथल का भारत पर प्रभाव पड़ सकता है:
भारत को बांग्लादेश की स्थिति पर करीबी नजर रखनी चाहिए और अपने हितों की सुरक्षा के लिए सक्रिय कूटनीति में संलग्न होना चाहिए। सीमा सुरक्षा को मजबूत करना, संभावित मानवीय प्रतिक्रियाओं के लिए तैयार रहना और बांग्लादेश में सभी राजनीतिक दलों के साथ खुले चैनलों को बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा। इसके अतिरिक्त, भारत को यह सुनिश्चित करने के लिए अन्य क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों के साथ काम करना चाहिए कि बांग्लादेश स्थिर और लोकतांत्रिक बना रहे, जिससे उग्रवादी समूहों का उदय न हो और दक्षिण एशिया में एक संतुलित भू-राजनीतिक परिदृश्य बनाए रखा जा सके।
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भारत की विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा, आर्थिक विकास को बढ़ावा देना, और वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति को मजबूत करना है। समय के साथ भारत की विदेश नीति में विभिन्न वैश्विक और क्षेत्रीय परिवर्तनों के साथ समायोजन किए गए हैं।
गुटनिरपेक्षता से बहुपक्षीयता तक: शीत युद्ध के दौरान, भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) का नेतृत्व किया। हाल के वर्षों में, भारत ने बहुपक्षीय संगठनों में अपनी भागीदारी बढ़ाई है, जैसे कि ब्रिक्स, आईबीएसए, और शंघाई सहयोग संगठन (SCO)।
लुक ईस्ट से एक्ट ईस्ट: भारत ने अपनी ‘लुक ईस्ट’ नीति को ‘एक्ट ईस्ट’ नीति में परिवर्तित किया है, जिसका उद्देश्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करना है।
नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी: भारत ने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को प्राथमिकता दी है। इसका उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग को बढ़ावा देना है। श्रीलंका इस नीति का एक महत्वपूर्ण भागीदार है।
वैश्विक भूमिका: भारत अब जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, और वैश्विक स्वास्थ्य जैसे वैश्विक मुद्दों पर एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभर रहा है। इसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग भी शामिल है।
भारत और श्रीलंका के बीच के संबंध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, और भौगोलिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं। दोनों देशों के बीच विभिन्न मुद्दों पर सहयोग और विवाद रहे हैं।
तमिल मुद्दा: श्रीलंका में तमिलों के अधिकारों और स्थिति को लेकर भारत और श्रीलंका के बीच ऐतिहासिक रूप से जटिल संबंध रहे हैं। भारत ने 1980 के दशक में श्रीलंका के गृहयुद्ध के दौरान शांति प्रयासों में भाग लिया और तमिल अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई।
मछुआरा विवाद: भारत और श्रीलंका के मछुआरों के बीच समुद्री क्षेत्र में मछली पकड़ने को लेकर विवाद होता है। यह मुद्दा दोनों देशों के बीच तनाव का कारण बनता है।
आर्थिक सहयोग: भारत और श्रीलंका के बीच व्यापार, निवेश और विकास परियोजनाओं में आर्थिक सहयोग बढ़ रहा है। भारत श्रीलंका का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है और विभिन्न परियोजनाओं में निवेश करता है।
चीन की बढ़ती उपस्थिति: श्रीलंका में चीन की बढ़ती आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति भारत के लिए चिंता का विषय है। हंबनटोटा पोर्ट और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में चीन के निवेश ने भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा पर प्रश्नचिन्ह लगाया है।
भारत की विदेश नीति पर प्रमुख वैश्विक शक्तियों का प्रभाव महत्वपूर्ण है, खासकर अमेरिका, चीन और रूस के संदर्भ में।
अमेरिका: भारत और अमेरिका के संबंध पिछले दो दशकों में काफी मजबूत हुए हैं। दोनों देशों ने रक्षा, व्यापार और प्रौद्योगिकी में कई समझौते किए हैं। अमेरिका का भारत को रणनीतिक साझेदार के रूप में देखना, विशेषकर चीन के प्रभाव को संतुलित करने के संदर्भ में, महत्वपूर्ण है।
चीन: भारत और चीन के संबंध जटिल हैं। श्रीलंका में चीन की बढ़ती उपस्थिति, जैसे कि बुनियादी ढांचे के विकास और आर्थिक निवेश, भारत के लिए चिंता का विषय हैं। चीन की ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) और श्रीलंका में उसके निवेश भारत के लिए रणनीतिक चुनौती पेश करते हैं।
रूस: भारत और रूस के बीच लंबे समय से मजबूत संबंध रहे हैं, विशेषकर रक्षा क्षेत्र में। हाल के वर्षों में रूस और चीन के निकट संबंधों ने भारत के लिए नई चुनौतियाँ पेश की हैं। फिर भी, भारत रूस के साथ अपनी पारंपरिक मित्रता को बनाए रखना चाहता है, विशेषकर बहुपक्षीय संगठनों में।
यूरोपीय संघ: भारत और यूरोपीय संघ के बीच आर्थिक और राजनीतिक संबंध महत्वपूर्ण हैं। यूरोपीय संघ भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है, और दोनों के बीच रणनीतिक साझेदारी क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर सहयोग को बढ़ावा देती है।
अन्य शक्तियाँ: जापान, ऑस्ट्रेलिया और ASEAN देशों के साथ भारत के संबंध भी महत्वपूर्ण हैं। ये संबंध आर्थिक सहयोग, समुद्री सुरक्षा, और क्षेत्रीय स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारत की विदेश नीति की गतिशीलता, श्रीलंका मुद्दे की पेचीदगियों और प्रमुख वैश्विक शक्तियों से जुड़े भू-राजनीतिक स्थिरता के निहितार्थ को समझना यूपीएससी उम्मीदवारों के लिए आवश्यक है। यह न केवल भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास को प्रभावित करता है, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका को भी निर्धारित करता है। उम्मीदवारों को इन पहलुओं की गहन समझ होनी चाहिए ताकि वे एक प्रभावी और सूचित सिविल सेवक बन सकें।
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यूपीएससी उम्मीदवारों के लिए भारत की विदेश नीति की गतिशीलता, बांग्लादेश मुद्दे की पेचीदगियों और प्रमुख वैश्विक शक्तियों से जुड़े भू-राजनीतिक स्थिरता के व्यापक निहितार्थ को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह न केवल परीक्षा की दृष्टि से बल्कि एक प्रभावी सिविल सेवक के रूप में भी आवश्यक है, क्योंकि यह भारत की अंतर्राष्ट्रीय स्थिति और सुरक्षा को प्रभावित करता है।
भारत की विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा, आर्थिक विकास को बढ़ावा देना, और वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति को मजबूत करना है। स्वतंत्रता के बाद से, भारत की विदेश नीति समय के साथ विकसित हुई है, जिसमें विभिन्न वैश्विक और क्षेत्रीय परिवर्तनों को शामिल किया गया है।
गुटनिरपेक्षता से बहुपक्षीयता तक: शीत युद्ध के दौरान, भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) का नेतृत्व किया, जिससे उसे दोनों महाशक्तियों (अमेरिका और सोवियत संघ) के बीच तटस्थ रहने का मौका मिला। हाल के वर्षों में, भारत ने बहुपक्षीय संगठनों में अपनी भागीदारी बढ़ाई है, जैसे कि ब्रिक्स, आईबीएसए, और शंघाई सहयोग संगठन (SCO)।
लुक ईस्ट से एक्ट ईस्ट: भारत ने अपनी ‘लुक ईस्ट’ नीति को ‘एक्ट ईस्ट’ नीति में परिवर्तित किया है, जिसका उद्देश्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करना है।
नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी: भारत ने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को प्राथमिकता दी है। इसका उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग को बढ़ावा देना है।
वैश्विक भूमिका: भारत अब वैश्विक मुद्दों पर एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभर रहा है, जैसे कि जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, और वैश्विक स्वास्थ्य। इसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग भी शामिल है।
भारत और बांग्लादेश के संबंध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, और भौगोलिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं। 1971 में बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम के समय भारत की भूमिका ने दोनों देशों के बीच गहरे संबंधों की नींव रखी।
सीमा विवाद: भारत और बांग्लादेश के बीच भूमि और समुद्री सीमा विवाद रहे हैं, जिन्हें हाल के वर्षों में सुलझा लिया गया है। 2015 में भूमि सीमा समझौते ने 40 वर्षों पुराने विवाद को समाप्त कर दिया।
नदी जल बंटवारा: गंगा, ब्रह्मपुत्र, और तीस्ता नदियों के जल बंटवारे को लेकर दोनों देशों के बीच मुद्दे रहे हैं। तीस्ता नदी का जल बंटवारा अभी भी विवादित है और दोनों देशों के बीच तनाव का कारण है।
अवैध प्रवास: बांग्लादेश से भारत में अवैध प्रवास एक प्रमुख मुद्दा है, खासकर असम और पश्चिम बंगाल राज्यों में। यह मुद्दा दोनों देशों के बीच राजनीतिक और सामाजिक तनाव को बढ़ाता है।
आर्थिक संबंध: भारत और बांग्लादेश के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ रहा है। दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और ऊर्जा सहयोग में वृद्धि हो रही है। बांग्लादेश भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, और दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध मजबूत हो रहे हैं।
भारत की विदेश नीति पर प्रमुख वैश्विक शक्तियों का प्रभाव महत्वपूर्ण है, खासकर अमेरिका, चीन और रूस के संदर्भ में।
अमेरिका: भारत और अमेरिका के संबंध पिछले दो दशकों में काफी मजबूत हुए हैं। दोनों देशों ने रक्षा, व्यापार और प्रौद्योगिकी में कई समझौते किए हैं। अमेरिका का भारत को रणनीतिक साझेदार के रूप में देखना, विशेषकर चीन के प्रभाव को संतुलित करने के संदर्भ में, महत्वपूर्ण है।
चीन: भारत और चीन के संबंध जटिल हैं। बांग्लादेश में चीन की बढ़ती उपस्थिति, जैसे कि बुनियादी ढांचे के विकास और आर्थिक निवेश, भारत के लिए चिंता का विषय हैं। चीन की ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) और बांग्लादेश में उसके निवेश भारत के लिए रणनीतिक चुनौती पेश करते हैं।
रूस: भारत और रूस के बीच लंबे समय से मजबूत संबंध रहे हैं, विशेषकर रक्षा क्षेत्र में। हाल के वर्षों में रूस और चीन के निकट संबंधों ने भारत के लिए नई चुनौतियाँ पेश की हैं। फिर भी, भारत रूस के साथ अपनी पारंपरिक मित्रता को बनाए रखना चाहता है, विशेषकर बहुपक्षीय संगठनों में।
यूरोपीय संघ: भारत और यूरोपीय संघ के बीच आर्थिक और राजनीतिक संबंध महत्वपूर्ण हैं। यूरोपीय संघ भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है, और दोनों के बीच रणनीतिक साझेदारी क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर सहयोग को बढ़ावा देती है।
अन्य शक्तियाँ: जापान, ऑस्ट्रेलिया और ASEAN देशों के साथ भारत के संबंध भी महत्वपूर्ण हैं। ये संबंध आर्थिक सहयोग, समुद्री सुरक्षा, और क्षेत्रीय स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारत की विदेश नीति की गतिशीलता, बांग्लादेश मुद्दे की पेचीदगियों और प्रमुख वैश्विक शक्तियों से जुड़े भू-राजनीतिक स्थिरता के निहितार्थ को समझना यूपीएससी उम्मीदवारों के लिए आवश्यक है। यह न केवल भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास को प्रभावित करता है, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका को भी निर्धारित करता है। उम्मीदवारों को इन पहलुओं की गहन समझ होनी चाहिए ताकि वे एक प्रभावी और सूचित सिविल सेवक बन सकें।
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भारत की विदेश नीति की गतिशीलता, मॉरिशस के चीन से बढ़ती नजदीकियां और भारत सरकार के विरोध के मुद्दे की पेचीदगियों और प्रमुख वैश्विक शक्तियों से जुड़े भू-राजनीतिक स्थिरता के व्यापक निहितार्थ को समझना यूपीएससी उम्मीदवारों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह विश्लेषण न केवल परीक्षा की दृष्टि से बल्कि एक प्रभावी सिविल सेवक के रूप में भी आवश्यक है, क्योंकि यह भारत की अंतर्राष्ट्रीय स्थिति और सुरक्षा को प्रभावित करता है।
भारत की विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा, आर्थिक विकास को बढ़ावा देना, और वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति को मजबूत करना है। स्वतंत्रता के बाद से, भारत की विदेश नीति समय के साथ विकसित हुई है, जिसमें विभिन्न वैश्विक और क्षेत्रीय परिवर्तनों को शामिल किया गया है।
गुटनिरपेक्षता से बहुपक्षीयता तक: शीत युद्ध के दौरान, भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) का नेतृत्व किया। हाल के वर्षों में, भारत ने बहुपक्षीय संगठनों में अपनी भागीदारी बढ़ाई है, जैसे कि ब्रिक्स, आईबीएसए, और शंघाई सहयोग संगठन (SCO)।
लुक ईस्ट से एक्ट ईस्ट: भारत ने अपनी ‘लुक ईस्ट’ नीति को ‘एक्ट ईस्ट’ नीति में परिवर्तित किया है, जिसका उद्देश्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करना है।
नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी: भारत ने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को प्राथमिकता दी है। इसका उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग को बढ़ावा देना है।
वैश्विक भूमिका: भारत अब जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, और वैश्विक स्वास्थ्य जैसे वैश्विक मुद्दों पर एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभर रहा है। इसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग भी शामिल है।
मॉरिशस के चीन से बढ़ते संबंध भारत के लिए चिंता का विषय हैं। यह भारत की विदेश नीति के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती है, विशेषकर हिंद महासागर क्षेत्र में।
आर्थिक निवेश और विकास परियोजनाएं: चीन मॉरिशस में बुनियादी ढांचे और विकास परियोजनाओं में भारी निवेश कर रहा है। यह भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि यह चीन की हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती उपस्थिति को दर्शाता है।
सुरक्षा चिंताएं: चीन की रणनीतिक उपस्थिति, विशेषकर नौसेना अड्डों और बंदरगाहों के निर्माण में, भारत की सुरक्षा के लिए खतरा हो सकती है। यह चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति का हिस्सा है, जो हिंद महासागर में भारत को घेरने की योजना है।
राजनीतिक और कूटनीतिक प्रभाव: चीन मॉरिशस में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए राजनीतिक और कूटनीतिक प्रयास कर रहा है। यह भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि मॉरिशस एक महत्वपूर्ण सामरिक सहयोगी है।
मॉरिशस की विदेश नीति: मॉरिशस ने अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है, लेकिन चीन के साथ उसके बढ़ते संबंध भारत के साथ उसके पारंपरिक संबंधों को प्रभावित कर सकते हैं।
भारत की विदेश नीति पर प्रमुख वैश्विक शक्तियों का प्रभाव महत्वपूर्ण है, खासकर अमेरिका, चीन और रूस के संदर्भ में।
अमेरिका: भारत और अमेरिका के संबंध पिछले दो दशकों में काफी मजबूत हुए हैं। दोनों देशों ने रक्षा, व्यापार और प्रौद्योगिकी में कई समझौते किए हैं। अमेरिका का भारत को रणनीतिक साझेदार के रूप में देखना, विशेषकर चीन के प्रभाव को संतुलित करने के संदर्भ में, महत्वपूर्ण है।
चीन: भारत और चीन के संबंध जटिल हैं। मॉरिशस में चीन की बढ़ती उपस्थिति, जैसे कि बुनियादी ढांचे के विकास और आर्थिक निवेश, भारत के लिए चिंता का विषय हैं। चीन की ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) और मॉरिशस में उसके निवेश भारत के लिए रणनीतिक चुनौती पेश करते हैं।
रूस: भारत और रूस के बीच लंबे समय से मजबूत संबंध रहे हैं, विशेषकर रक्षा क्षेत्र में। हाल के वर्षों में रूस और चीन के निकट संबंधों ने भारत के लिए नई चुनौतियाँ पेश की हैं। फिर भी, भारत रूस के साथ अपनी पारंपरिक मित्रता को बनाए रखना चाहता है, विशेषकर बहुपक्षीय संगठनों में।
यूरोपीय संघ: भारत और यूरोपीय संघ के बीच आर्थिक और राजनीतिक संबंध महत्वपूर्ण हैं। यूरोपीय संघ भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है, और दोनों के बीच रणनीतिक साझेदारी क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर सहयोग को बढ़ावा देती है।
अन्य शक्तियाँ: जापान, ऑस्ट्रेलिया और ASEAN देशों के साथ भारत के संबंध भी महत्वपूर्ण हैं। ये संबंध आर्थिक सहयोग, समुद्री सुरक्षा, और क्षेत्रीय स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारत की विदेश नीति की गतिशीलता, मॉरिशस के चीन से बढ़ती नजदीकियां और भारत के विरोध की पेचीदगियों और प्रमुख वैश्विक शक्तियों से जुड़े भू-राजनीतिक स्थिरता के निहितार्थ को समझना यूपीएससी उम्मीदवारों के लिए आवश्यक है। यह न केवल भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास को प्रभावित करता है, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका को भी निर्धारित करता है। उम्मीदवारों को इन पहलुओं की गहन समझ होनी चाहिए ताकि वे एक प्रभावी और सूचित सिविल सेवक बन सकें।
India and China
यूपीएससी उम्मीदवारों के लिए भारत की विदेश नीति की गतिशीलता, चीन मुद्दे की पेचीदगियों और प्रमुख वैश्विक शक्तियों से जुड़े भू-राजनीतिक युद्धाभ्यास के व्यापक निहितार्थ को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह न केवल परीक्षा की दृष्टि से बल्कि एक प्रभावी सिविल सेवक के रूप में भी आवश्यक है, क्योंकि यह भारत की अंतर्राष्ट्रीय स्थिति और सुरक्षा को प्रभावित करता है।
भारत की विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा, आर्थिक विकास को बढ़ावा देना, और वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति को मजबूत करना है। भारत की विदेश नीति समय के साथ विकसित हुई है, जिसमें विभिन्न वैश्विक और क्षेत्रीय परिवर्तनों को शामिल किया गया है।
गुटनिरपेक्षता से बहुपक्षीयता तक: शीत युद्ध के दौरान, भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) का नेतृत्व किया, जिससे उसे दोनों महाशक्तियों (अमेरिका और सोवियत संघ) के बीच तटस्थ रहने का मौका मिला। हाल के वर्षों में, भारत ने बहुपक्षीय संगठनों में अपनी भागीदारी बढ़ाई है, जैसे कि ब्रिक्स, आईबीएसए, और शंघाई सहयोग संगठन (SCO)।
लुक ईस्ट से एक्ट ईस्ट: भारत ने अपनी ‘लुक ईस्ट’ नीति को ‘एक्ट ईस्ट’ नीति में परिवर्तित किया है, जिसका उद्देश्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करना है।
नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी: भारत ने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को प्राथमिकता दी है। इसका उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग को बढ़ावा देना है।
वैश्विक भूमिका: भारत अब वैश्विक मुद्दों पर एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभर रहा है, जैसे कि जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, और वैश्विक स्वास्थ्य। इसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग भी शामिल है।
भारत और चीन के बीच के संबंध कई महत्वपूर्ण और जटिल मुद्दों पर आधारित हैं, जिनमें सीमा विवाद, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय प्रभुत्व शामिल हैं।
सीमा विवाद: भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर लंबे समय से विवाद है। 1962 का युद्ध और हाल के डोकलाम और गलवान घाटी में संघर्ष दोनों देशों के बीच तनाव का प्रमुख कारण हैं।
आर्थिक प्रतिस्पर्धा: भारत और चीन के बीच आर्थिक क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा है। चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, लेकिन व्यापार असंतुलन और चीनी उत्पादों पर निर्भरता भारत के लिए चिंता का विषय हैं।
क्षेत्रीय प्रभुत्व: चीन की ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) और हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी बढ़ती उपस्थिति भारत के लिए चुनौतीपूर्ण हैं। इसके अलावा, पाकिस्तान के साथ चीन के निकट संबंध और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) भारत की रणनीतिक चिंताओं को बढ़ाते हैं।
वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धा: संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भारत और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा है। भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग और विभिन्न वैश्विक मुद्दों पर दोनों देशों की विभिन्न दृष्टिकोण भी महत्वपूर्ण हैं।
भारत की विदेश नीति पर प्रमुख वैश्विक शक्तियों का प्रभाव महत्वपूर्ण है, खासकर अमेरिका, रूस और यूरोपीय संघ के संदर्भ में।
अमेरिका: भारत और अमेरिका के संबंध पिछले दो दशकों में काफी मजबूत हुए हैं। दोनों देशों ने रक्षा, व्यापार और प्रौद्योगिकी में कई समझौते किए हैं। अमेरिका का भारत को रणनीतिक साझेदार के रूप में देखना, विशेषकर चीन के प्रभाव को संतुलित करने के संदर्भ में, महत्वपूर्ण है। क्वाड (Quad) जैसे समूहों में भारत की भागीदारी भी इसी रणनीति का हिस्सा है।
रूस: भारत और रूस के बीच लंबे समय से मजबूत संबंध रहे हैं, विशेषकर रक्षा क्षेत्र में। हालांकि, हाल के वर्षों में रूस और चीन के निकट संबंधों ने भारत के लिए नई चुनौतियाँ पेश की हैं। फिर भी, भारत रूस के साथ अपनी पारंपरिक मित्रता को बनाए रखना चाहता है, विशेषकर बहुपक्षीय संगठनों में।
यूरोपीय संघ: भारत और यूरोपीय संघ के बीच आर्थिक और राजनीतिक संबंध महत्वपूर्ण हैं। यूरोपीय संघ भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार है, और दोनों के बीच रणनीतिक साझेदारी क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर सहयोग को बढ़ावा देती है।
अन्य शक्तियाँ: जापान, ऑस्ट्रेलिया और ASEAN देशों के साथ भारत के संबंध भी महत्वपूर्ण हैं। ये संबंध आर्थिक सहयोग, समुद्री सुरक्षा, और क्षेत्रीय स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारत की विदेश नीति की गतिशीलता, चीन मुद्दे की पेचीदगियों और प्रमुख वैश्विक शक्तियों से जुड़े भू-राजनीतिक युद्धाभ्यास को समझना यूपीएससी उम्मीदवारों के लिए आवश्यक है। यह न केवल भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास को प्रभावित करता है, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका को भी निर्धारित करता है। उम्मीदवारों को इन पहलुओं की गहन समझ होनी चाहिए ताकि वे एक प्रभावी और सूचित सिविल सेवक बन सकें।